आज भी याद है ,मुझे वो मौन व्रत अपना
जो व्रत कम पर सज़ा ,ज्यादा था मेरे लिए
यूँ तो हरदम लड़ते थे हम दोनों
पर उस दिन हँसी में कही तुम्हारी बात
लगी थी नश्तर बन कर .........
और फांस की तरह चुभा था गले में कुछ मेरे
बस सोच लिया तभी के नही करुँगी तुमसे बात
पर कब तक यह नही तय कर पाई थी
तुमने भी तो नही पूछा था
कुछ मुझसे कि कब तक
रह पाओगी मुझे बिन बुलाये।......
एक दो करके बीत गए सात दिन
पर टस से मस न हुई थी मैं,
अब तो झलक रही थी उदासी
तुम्हारी आँखों में भी .....
जा रहे थे तुम 15 दिन के लिए
और खुश थे कि अब तो ज़रूर बुलाएगी
पर तुम्हारे जाने से पहले ही
अगली सुबह चली गयी थी मंदिर
पत्थर रख के दिल पे अपने .......
जब भेजा था वहां से कार्ड मुझे
Miss You So Much....का
तो आँख भर आई थी मेरी
कोसा था खुद को मैंने ......
आ रहे थे उस शाम तुम वापिस
ठीक समय पर पहुँच गयी थी
दरवाजे पे तुम्हे देखने को
पर देख कर भी कुछ बोली न जब
तो तुम बोल उठे थे ....
नाराज़ हो अब तक ??????
फूट फूट कर रो पड़ी थी मैं
गले से लगकर तुम्हारे।.....
चुप अच्छी नही लगती तू
बात किया कर मुझसे
नहीं तो मर जाएगी।......
बस इतना ही बोले थे तुम
और उसी पल सोच लिया
था मैंने कि इतना कठिन
व्रत न करुँगी कभी भी
जो मेरे साथ साथ सज़ा
दे किसी और को भी ....................
जो व्रत कम पर सज़ा ,ज्यादा था मेरे लिए
यूँ तो हरदम लड़ते थे हम दोनों
पर उस दिन हँसी में कही तुम्हारी बात
लगी थी नश्तर बन कर .........
और फांस की तरह चुभा था गले में कुछ मेरे
बस सोच लिया तभी के नही करुँगी तुमसे बात
पर कब तक यह नही तय कर पाई थी
तुमने भी तो नही पूछा था
कुछ मुझसे कि कब तक
रह पाओगी मुझे बिन बुलाये।......
एक दो करके बीत गए सात दिन
पर टस से मस न हुई थी मैं,
अब तो झलक रही थी उदासी
तुम्हारी आँखों में भी .....
जा रहे थे तुम 15 दिन के लिए
और खुश थे कि अब तो ज़रूर बुलाएगी
पर तुम्हारे जाने से पहले ही
अगली सुबह चली गयी थी मंदिर
पत्थर रख के दिल पे अपने .......
जब भेजा था वहां से कार्ड मुझे
Miss You So Much....का
तो आँख भर आई थी मेरी
कोसा था खुद को मैंने ......
आ रहे थे उस शाम तुम वापिस
ठीक समय पर पहुँच गयी थी
दरवाजे पे तुम्हे देखने को
पर देख कर भी कुछ बोली न जब
तो तुम बोल उठे थे ....
नाराज़ हो अब तक ??????
फूट फूट कर रो पड़ी थी मैं
गले से लगकर तुम्हारे।.....
चुप अच्छी नही लगती तू
बात किया कर मुझसे
नहीं तो मर जाएगी।......
बस इतना ही बोले थे तुम
और उसी पल सोच लिया
था मैंने कि इतना कठिन
व्रत न करुँगी कभी भी
जो मेरे साथ साथ सज़ा
दे किसी और को भी ....................
bahut behtareen likha hai...
ReplyDeleteSuperlyk
ReplyDeleteबहुत सुंदर...होली शुभ हो!!
ReplyDelete